शासन के नैतिक पतन के खिलाफ जेन-जी का विद्रोह
लेखक: प्रभात पटनायक | अनुवाद: राजेंद्र शर्मा
देश भर में छात्रों के हालिया प्रदर्शन को सिर्फ बेरोजगारी और पेपर लीक से जोड़कर देखा जा रहा है। यह सच है कि बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने युवाओं में गुस्सा भरा है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है।
इस आंदोलन के पीछे इससे भी गहरी वजह है।
जब एक 15 साल की लड़की अपनी मां से झूठ बोलकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचती है, तो जाहिर है वह सिर्फ अपनी नौकरी के लिए चिंतित नहीं है। वह किसी बड़ी व्यवस्था से आहत है। जब बिना किसी नेता और बिना किसी संगठन के यह आंदोलन खुद-ब-खुद देश के हर शहर तक फैल जाता है, तो इसके पीछे एक सामूहिक मोहभंग काम कर रहा होता है।
बिना नेता वाला आंदोलन, इसलिए सत्ता बेबस
इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि इसका कोई चेहरा नहीं था। वर्तमान सत्ता किसी भी आंदोलन को उसके नेताओं को तोड़कर, खरीदकर या डराकर खत्म करने में माहिर है। लेकिन जब कोई नेता ही न हो, तो सारे हथकंडे फेल हो जाते हैं।
यही वजह है कि सोनम वांगचुक के अनशन तोड़ने का भी इस आंदोलन पर असर नहीं पड़ा। छात्रों ने साफ कर दिया था कि वे किसी व्यक्ति के पीछे नहीं, बल्कि अपनी तीन मांगों के पीछे एकजुट हैं और उन पर कोई समझौता नहीं होगा।
इस्तीफे की मांग, नैतिकता की मांग थी
छात्रों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की। जंतर-मंतर पर खड़ा हर युवा जानता था कि एक इस्तीफे से शिक्षा व्यवस्था नहीं सुधरेगी। फिर भी वे इस मांग पर अड़े रहे।
क्यों? क्योंकि यह मांग जवाबदेही तय करने की थी। छात्रों का सवाल था कि जब पेपर लीक होता है तो सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई क्यों, सत्ता में बैठे लोगों की नैतिक जिम्मेदारी क्यों तय नहीं होती? सरकार का फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का वादा भी इसी नैतिक सवाल के सामने फीका पड़ गया।
यह लड़ाई व्यवस्था में जवाबदेही और नैतिकता वापस लाने की लड़ाई बन गई थी।
ये नैतिक खोखलापन फासीवाद की पहचान है
लेखक के मुताबिक, सत्ता का यह नैतिक खोखलापन किसी भी फासीवादी व्यवस्था की पहचान होता है। इतिहास गवाह है कि जर्मनी में नाजी आंदोलन भी इजारेदार पूंजी के खिलाफ नारों से शुरू हुआ था, लेकिन सत्ता मिलते ही उसने उसी पूंजी से समझौता कर लिया और अपने ही साथियों का कत्लेआम तक करवा दिया, जिसे 'नाइट ऑफ लांग नाइव्स' कहा गया।
आज भी जब सत्ता को अपने इस खोखलेपन को छिपाना होता है, तो उसे बड़े प्रचार और फिल्मी सितारों से नारे लगवाने की जरूरत पड़ती है।
छात्र आंदोलन की ताकत और उसकी सीमा
छात्र ही वह वर्ग है जो सबसे ज्यादा आदर्शवादी, निर्भीक और नैतिकता के प्रति सजग होता है। इसलिए वह इस तरह के खोखलेपन के खिलाफ सबसे बेहतर तरीके से लड़ सकता है।
हालांकि, इस आंदोलन की एक सीमा भी थी। यह किसी संस्थागत बदलाव की मांग नहीं कर रहा था। अगर इसमें संस्थागत बदलाव की मांगें जुड़तीं, तो शायद यह इतना व्यापक और स्वतःस्फूर्त नहीं बन पाता।
किसान आंदोलन से इसकी तुलना करें तो किसान आंदोलन वर्गीय हितों और संस्थागत बदलावों के लिए था, जबकि छात्र आंदोलन नैतिक आचरण की मांग के लिए था।
फिर भी, इस आंदोलन ने एक बड़ा काम किया है - इसने 'सर्वोच्च नेता कभी गलती नहीं करता' के मिथक को तोड़ा है और सालों से बना डर का माहौल खत्म किया है। इसने आने वाले समय में एक बड़ी राजनीतिक चुनौती के लिए जमीन तैयार कर दी है।
डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं।

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