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दिव्यांग सहायक प्रोफेसर मोहम्मद अबू बकर युवाओं एवं दिव्यांग जनों के लिए बने प्रेरणा




दिव्यांग सहायक प्रोफेसर मोहम्मद अबू बकर युवाओं एवं दिव्यांग जनों के लिए बने प्रेरणा 



3 साल की उम्र में पोलियो जैसी खतरनाक बीमारी ने मोहम्मद अबू बकर को 60% दिव्यांग बना दिया लेकिन उन्होंने दिव्यांगता को ही अपना ताकत बनाया 


अपने गांव एवं मोहल्ले में बच्चों को निशुल्क शिक्षा एवं अनुशासन भी सीखा रहे हैं साथ ही साथ सामाजिक कार्यों में भी बढ़कर कर हिस्सा लेते हैं रक्तदान की बात की जाए तो मुंगेर शहर में मिसाल बने हैं 


जब कभी भी जरूरतमंद आवाज देते वह स्वयं पहुंच जाते 20 से भी अधिक बार 30 वर्षीय अबू बकर रक्तदान कर चुके हैं लोगों को रोजगार दिलाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं


फिलहाल वह मुंगेर विश्वविद्यालय मुंगेर के कॉलेज जेआरएस में उर्दू की शिक्षा दे रहे हैं और छात्र एवं छात्राएं उनके शिक्षा को खूब पसंद करते हैं सहायक प्रोफेसर मोहम्मद अबू बकर शिक्षा के साथ-साथ अनुशासन एवं समाज के प्रति समर्पण की भी ज्ञान देते हैं यही वजह शहर में लोकप्रियता के साथ-साथ अनुशासन भी देते हैं उन्होंने कहा हमारे मोटिवेशन से हमारे ज्ञान से किसी का भला हो जाए यह हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि ठीक है

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