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ऐसे तो ब्रज की होली जगत प्रसिद्ध है लेकिन बिहार वासियों के लिए भी होली ब्रज की होली से कम नहीं

 


ऐसे तो ब्रज की होली जगत प्रसिद्ध है लेकिन बिहार वासियों के लिए भी होली ब्रज की होली से कम नहीं है। बिहारवासी भी इस त्यौहार को बहुत ही खुशी उमंग और उत्साह के साथ मनाते हैं। इस राज्य के निवासी जहां होली के हुड़दंग में मस्त रहते हैं वहीं मुंगेर जिला का एक ऐसा गांव जहां इस दिन पूरे गांव में सन्नाटा रहता है कोई हलचल भी देखने को नहीं मिलती है। यह गांव संग्रामपुर प्रखंड के बलिया पंचायत अंतर्गत है और इस गांव का नाम है कुआंगढ़ी। जहां पूरे गांव के लोग होली नहीं मनाते हैं, होली का आनंद नहीं उठा पाते हैं। यहां कब से होली नहीं खेली जाती है इसका ठीक-ठाक अनुमान लगाना मुश्किल है। बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि हम लोगों ने भी इस त्यौहार को कभी नहीं मनाया और इसके पहले भी गांव के लोगों को मनाते नहीं देखा। युवाओं से संपर्क साधने पर उनके दिल का दर्द छलक आया। वे कहते हैं कि आसपास के गांव से जब ढोलक की थाप और मंजीरे की आवाज के साथ होली के रस भरे गीत कानों में पड़ते हैं तो हम लोगों का मन भी होली खेलने के लिए मचल उठता है। लेकिन वर्जनाएं उसे रोक लेती हैं। और हम लोग अपने दिलों को समझा बुझाकर शांत कर लेते हैं। होली एक ऐसा पर्व है जिसमें न कोई वर्ण भेद रंग भेद न जाति भेद न लिंग भेद देखा जाता है। ऐसे में भी यहां सभी वंचित रह जाते हैं और होली के हुड़दंग का मजा नहीं ले पाते हैं। छोटे-छोटे बच्चे भी मन मसोस कर रह जाते हैं। जिस तरह हिंदी व्याकरण के अनुसार सभी दीर्घकारांत शब्द स्त्रीलिंग होते हैं लेकिन दही ,मोती, घी ,जी ,और पानी पुलिंग होते हैं क्योंकि इसे अपवाद माना जाता है उसी तरह कुआंगढ़ी गांव भी अपवाद है जहां होली जैसा पर्व नहीं मनाया जाता है।

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